शहर की रात और मै नाशादो नाकारा फिरूँ,
जगमगाती जागती सडको पे आवारा फिरुँ,
गैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरुँ,
ऎ गमे दिल ! क्या करूँ, ऎ वहशते दिल ! क्या करूँ ?
रास्ते मे रुक के दम लेना मेरी आदत नही,
लौट कर वापस चला जाऊँ मेरी फितरत नही,
और कोई हमनवा मिल जाये ये किस्मत नही,
ऎ गमे दिल ! क्या करूँ, ऎ वहशते दिल ! क्या करूँ ?
जी मे आता है ये मुर्दा चाँद तारे नोच लूँ,
इस किनारे नोच लूँ और उस किनारे नोच लूँ,
एक-दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूँ
ऎ गमे दिल ! क्या करूँ, ऎ वहशते दिल ! क्या करूँ ?
मुफलिसी और यह मज़ाहिर है नज़र के सामने,
सैकडो सुल्ताने-ज़ाबिर है नज़र के सामने,
सैकडो चंगेज़ो-नादिर है नज़र के सामने,
ऎ गमे दिल ! क्या करूँ, ऎ वहशते दिल ! क्या करूँ ?
ले के इक चंगेज़ के हाथो से खंज़र तोड दूँ,
ताज़ पर इसके दमकता है जो पत्थर तोड दूँ,
कोई तोडॆ या न तोडे मै ही बढकर तोड दूँ,
ऎ गमे दिल ! क्या करूँ, ऎ वहशते दिल ! क्या करूँ ?
बढ के इस इन्दर सभा का साज़ो सामाँ फूँक दूँ,
इसका गुलशन फूँक दूँ उसका शबिस्ताँ फूँक दूँ,
तख्ते सुल्ताँ क्या मै सारा कस्रे सुल्ताँ फूँक दूँ,
ऎ गमे दिल ! क्या करूँ, ऎ वहशते दिल ! क्या करूँ ?
---- इसरारुलहक़ मजाज़
नाशादो नाकारा - दुखी और बेकार
मज़ाहिर - दृश्य
सुल्ताने ज़ाबिर - बलवान ज़ालिम
कस्रे सुल्ताँ - बादशाह का महल
Thursday, August 9, 2007
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