Thursday, August 9, 2007

आवारापन

शहर की रात और मै नाशादो नाकारा फिरूँ,
जगमगाती जागती सडको पे आवारा फिरुँ,
गैर की बस्ती है कब तक दर-ब-दर मारा फिरुँ,
ऎ गमे दिल ! क्या करूँ, ऎ वहशते दिल ! क्या करूँ ?
रास्ते मे रुक के दम लेना मेरी आदत नही,
लौट कर वापस चला जाऊँ मेरी फितरत नही,
और कोई हमनवा मिल जाये ये किस्मत नही,
ऎ गमे दिल ! क्या करूँ, ऎ वहशते दिल ! क्या करूँ ?
जी मे आता है ये मुर्दा चाँद तारे नोच लूँ,
इस किनारे नोच लूँ और उस किनारे नोच लूँ,
एक-दो का ज़िक्र क्या सारे के सारे नोच लूँ
ऎ गमे दिल ! क्या करूँ, ऎ वहशते दिल ! क्या करूँ ?
मुफलिसी और यह मज़ाहिर है नज़र के सामने,
सैकडो सुल्ताने-ज़ाबिर है नज़र के सामने,
सैकडो चंगेज़ो-नादिर है नज़र के सामने,
ऎ गमे दिल ! क्या करूँ, ऎ वहशते दिल ! क्या करूँ ?
ले के इक चंगेज़ के हाथो से खंज़र तोड दूँ,
ताज़ पर इसके दमकता है जो पत्थर तोड दूँ,
कोई तोडॆ या न तोडे मै ही बढकर तोड दूँ,
ऎ गमे दिल ! क्या करूँ, ऎ वहशते दिल ! क्या करूँ ?
बढ के इस इन्दर सभा का साज़ो सामाँ फूँक दूँ,
इसका गुलशन फूँक दूँ उसका शबिस्ताँ फूँक दूँ,
तख्ते सुल्ताँ क्या मै सारा कस्रे सुल्ताँ फूँक दूँ,
ऎ गमे दिल ! क्या करूँ, ऎ वहशते दिल ! क्या करूँ ?

---- इसरारुलहक़ मजाज़
नाशादो नाकारा - दुखी और बेकार
मज़ाहिर - दृश्य
सुल्ताने ज़ाबिर - बलवान ज़ालिम
कस्रे सुल्ताँ - बादशाह का महल


4 comments:

Ratna said...

Shayad kisi puraani hindi film me ye ghazal suni hai.

Amit K Sagar said...

जिन्हें बेहतरीन कलाम्कारों को भुला दिया गया, उन्हें इक़ जगह लाने की बाबत आपके इस बेहद सराहनीय और उम्दा ख़याल को मैं जितने भी धन्यवाद हूँ, काम हैं, और जितेने भी शब्द...काम हैं...अति उत्तम कार्य.
शुभकामनाएं.
---
ultateer.blogspot.com

Sajal Ehsaas said...

janaaba is blog ka vistaar kijiye...achhi soch hai ye

चिराग जैन CHIRAG JAIN said...

मेरे इस चिट्ठे पर जाएँ, शायद आपके काम का कुछ मिले-
www.bazmeghazal.blogspot.com